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शान्ति पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्हि पुरुषव्याघ्रे कर्मभिः स्वैर्दिवं गते |  २०   क
भविष्यति मही पार्थ नष्टचन्द्रेव शर्वरी ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति