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शान्ति पर्व
अध्याय १०६
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मुनिरु उवाच
असंशय़ं पुण्यशीलः प्राप्नोति परमां गतिम् |  १८   क
त्रिविष्टपे पुण्यतमं स्थानं प्राप्नोति पार्थिवः |  १८   ख
कोशक्षय़े त्वमित्राणां वशं कौसल्य गच्छति ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति