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शान्ति पर्व
अध्याय १६
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वैशम्पाय़न उवाच
यत्र नास्ति शरैः कार्यं न मित्रैर्न च वन्धुभिः |  २१   क
आत्मनैकेन योद्धव्यं तत्ते युद्धमुपस्थितम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति