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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
पृथिवी वाय़ुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् |  १७   क
एतद्योनीनि भूतानि तत्र का परिदेवना ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति