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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
मन्दरं मनुजव्याघ्र नीलं चापि महागिरिम् |  १०३   क
पश्यामि च महाराज मेरुं कनकपर्वतम् ||  १०३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति