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द्रोण पर्व
अध्याय १७१
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सञ्जय़ उवाच
स पौरवं रथशक्त्या निहत्य; छित्त्वा रथं तिलशश्चापि वाणैः |  ६४   क
छित्त्वास्य वाहू वरचन्दनाक्तौ; भल्लेन काय़ाच्छिर उच्चकर्त ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति