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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
कुक्षौ तस्य नरव्याघ्र प्रविष्टः सञ्चरन्दिशः |  १०७   क
शक्रादींश्चापि पश्यामि कृत्स्नान्देवगणांस्तथा ||  १०७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति