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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
गन्धर्वाप्सरसो यक्षानृषींश्चैव महीपते |  १०८   क
दैत्यदानवसङ्घांश्च कालेय़ांश्च नराधिप |  १०८   ख
सिंहिकातनय़ांश्चापि ये चान्ये सुरशत्रवः ||  १०८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति