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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
यच्च किञ्चिन्मय़ा लोके दृष्टं स्थावरजङ्गमम् |  १०९   क
तदपश्यमहं सर्वं तस्य कुक्षौ महात्मनः |  १०९   ख
फलाहारः प्रविचरन्कृत्स्नं जगदिदं तदा ||  १०९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति