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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तमेव शरणं गतोऽस्मि विधिवत्तदा |  ११२   क
वरेण्यं वरदं देवं मनसा कर्मणैव च ||  ११२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति