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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तस्यैव शाखाय़ां न्यग्रोधस्य विशां पते |  ११४   क
आस्ते मनुजशार्दूल कृत्स्नमादाय़ वै जगत् ||  ११४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति