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वन पर्व
अध्याय १८६
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वैशम्पाय़न उवाच
अनुभूतं हि वहुशस्त्वय़ैकेन द्विजोत्तम |  १२   क
न तेऽस्त्यविदितं किञ्चित्सर्वलोकेषु नित्यदा ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति