वन पर्व  अध्याय १८६

मार्कण्डेय़ उवाच

तव देव शरीरस्था देवदानवराक्षसाः |  १२४   क
यक्षगन्धर्वनागाश्च जगत्स्थावरजङ्गमम् ||  १२४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति