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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
एतदिच्छामि देवेश श्रोतुं व्राह्मणकाम्यया |  १२८   क
त्वत्तः कमलपत्राक्ष विस्तरेण यथातथम् |  १२८   ख
महद्ध्येतदचिन्त्यं च यदहं दृष्टवान्प्रभो ||  १२८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति