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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
एतत्सहस्रपर्यन्तमहो व्राह्ममुदाहृतम् |  २३   क
विश्वं हि व्रह्मभवने सर्वशः परिवर्तते |  २३   ख
लोकानां मनुजव्याघ्र प्रलय़ं तं विदुर्वुधाः ||  २३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति