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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
अजपा व्राह्मणास्तात शूद्रा जपपराय़णाः |  २८   क
विपरीते तदा लोके पूर्वरूपं क्षय़स्य तत् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति