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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
न तदा व्राह्मणः कश्चित्स्वधर्ममुपजीवति |  ३१   क
क्षत्रिय़ा अपि वैश्याश्च विकर्मस्था नराधिप ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति