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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
युगान्ते मनुजव्याघ्र भवन्ति वहुजन्तवः |  ३४   क
न तथा घ्राणय़ुक्ताश्च सर्वगन्धा विशां पते |  ३४   ख
रसाश्च मनुजव्याघ्र न तथा स्वादुय़ोगिनः ||  ३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति