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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
वहुपाषण्डसङ्कीर्णाः परान्नगुणवादिनः |  ४३   क
आश्रमा मनुजव्याघ्र न भवन्ति युगक्षय़े ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति