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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
तथा च पृथिवीपाल यो भवेद्धर्मसंय़ुतः |  ४५   क
अल्पाय़ुः स हि मन्तव्यो न हि धर्मोऽस्ति कश्चन ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति