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वन पर्व
अध्याय १८६
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वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्विधानि विप्रर्षे यथावत्परमेष्ठिना |  ५   क
वाय़ुभूता दिशः कृत्वा विक्षिप्यापस्ततस्ततः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति