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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
पुरुषादानि सत्त्वानि पक्षिणोऽथ मृगास्तथा |  ५१   क
नगराणां विहारेषु चैत्येष्वपि च शेरते ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति