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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
क्षीणे युगे महाराज तरुणा वृद्धशीलिनः |  ५४   क
तरुणानां च यच्छीलं तद्वृद्धेषु प्रजाय़ते ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति