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शान्ति पर्व
अध्याय २०५
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गुरुरु उवाच
राजसं तामसं चैव शुद्धात्माकर्मसम्भवम् |  २८   क
तत्सर्वं देहिनां वीजं सर्वमात्मवतः समम् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति