वन पर्व  अध्याय १८६

मार्कण्डेय़ उवाच

ततः स पृथिवीं भित्त्वा समाविश्य रसातलम् |  ६१   क
देवदानवय़क्षाणां भय़ं जनय़ते महत् ||  ६१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति