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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
निर्दहन्नागलोकं च यच्च किञ्चित्क्षिताविह |  ६२   क
अधस्तात्पृथिवीपाल सर्वं नाशय़ते क्षणात् ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति