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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततो योजनविंशानां सहस्राणि शतानि च |  ६३   क
निर्दहत्यशिवो वाय़ुः स च संवर्तकोऽनलः ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति