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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततो गजकुलप्रख्यास्तडिन्मालाविभूषिताः |  ६५   क
उत्तिष्ठन्ति महामेघा नभस्यद्भुतदर्शनाः ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति