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द्रोण पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठं रोचमानमिवातिथिम् |  ३१   क
वन्धुमापद्गतस्येव तमेवोपागमन्मनः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति