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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
वर्षमाणा महत्तोय़ं पूरय़न्तो वसुन्धराम् |  ७२   क
सुघोरमशिवं रौद्रं नाशय़न्ति च पावकम् ||  ७२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति