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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वतः सहसा भ्रान्तास्ते पय़ोदा नभस्तलम् |  ७५   क
संवेष्टय़ित्वा नश्यन्ति वाय़ुवेगपराहताः ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति