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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
निर्मनुष्ये महीपाल निःश्वापदमहीरुहे |  ७८   क
अनन्तरिक्षे लोकेऽस्मिन्भ्रमाम्येकोऽहमादृतः ||  ७८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति