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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततः कदाचित्पश्यामि तस्मिन्सलिलसम्प्लवे |  ८१   क
न्यग्रोधं सुमहान्तं वै विशालं पृथिवीपते ||  ८१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति