वन पर्व  अध्याय १८६

मार्कण्डेय़ उवाच

ततो मामव्रवीद्वालः स पद्मनिभलोचनः |  ८७   क
श्रीवत्सधारी द्युतिमान्वाक्यं श्रुतिसुखावहम् ||  ८७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति