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वन पर्व
अध्याय २००
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मार्कण्डेय़ उवाच
वहवः सम्प्रदृश्यन्ते तुल्यनक्षत्रमङ्गलाः |  २१   क
महच्च फलवैषम्यं दृश्यते कर्मसन्धिषु ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति