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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
अभ्यन्तरं शरीरं मे प्रविश्य मुनिसत्तम |  ८९   क
आस्स्व भो विहितो वासः प्रसादस्ते कृतो मय़ा ||  ८९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति