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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
प्रतिहन्य तदस्त्रं तु भारद्वाजस्य संय़ुगे |  १४   क
विव्याध व्राह्मणं षष्ट्या स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति