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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७१
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वैशम्पाय़न उवाच
स हि धर्मार्थकुशलः सर्वविद्याविशारदः |  १७   क
यथाशास्त्रं नृपश्रेष्ठ चारय़िष्यति ते हय़म् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति