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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततः पश्यामि गगनं चन्द्रसूर्यविराजितम् |  ९८   क
जाज्वल्यमानं तेजोभिः पावकार्कसमप्रभैः |  ९८   ख
पश्यामि च महीं राजन्काननैरुपशोभिताम् ||  ९८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति