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द्रोण पर्व
अध्याय १६९
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सञ्जय़ उवाच
अस्माकं पुरुषव्याघ्र मित्रमन्यन्न विद्यते |  ४८   क
परमन्धकवृष्णिभ्यः पाञ्चालेभ्यश्च माधव ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति