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शान्ति पर्व
अध्याय १२१
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भीष्म उवाच
जटी द्विजिह्वस्ताम्रास्यो मृगराजतनुच्छदः |  १५   क
एतद्रूपं विभर्त्युग्रं दण्डो नित्यं दुरावरः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति