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शान्ति पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
नैव नित्यं जय़स्तात नैव नित्यं पराजय़ः |  १७   क
तस्माद्भोजय़ितव्यश्च भोक्तव्यश्च परो जनः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति