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आदि पर्व
अध्याय १८७
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वैशम्पाय़न उवाच
ते समेत्य ततः सर्वे कथय़न्ति स्म भारत |  ३२   क
अथ द्वैपाय़नो राजन्नभ्यागच्छद्यदृच्छय़ा ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति