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आदि पर्व
अध्याय १८७
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वैशम्पाय़न उवाच
कृष्णाहेतोरनुप्राप्तान्दिवः सन्दर्शनार्थिनः |  ४   क
व्रवीतु नो भवान्सत्यं सन्देहो ह्यत्र नो महान् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति