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शान्ति पर्व
अध्याय १८७
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भीष्म उवाच
येन पश्यति तच्चक्षुः शृणोति श्रोत्रमुच्यते |  १८   क
जिघ्रति घ्राणमित्याहू रसं जानाति जिह्वय़ा ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति