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शान्ति पर्व
अध्याय १८७
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भीष्म उवाच
न सुखेन न दुःखेन कदाचिदपि वर्तते |  २२   क
एवं नराणां मनसि त्रिषु भावेष्ववस्थिता ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति