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शान्ति पर्व
अध्याय १८७
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भीष्म उवाच
इन्द्रिय़ाणि हि सर्वाणि प्रदर्शय़ति सा सदा |  २५   क
प्रीतिः सत्त्वं रजः शोकस्तमो मोहश्च ते त्रय़ः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति