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शान्ति पर्व
अध्याय १८७
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भीष्म उवाच
अभिमानस्तथा मोहः प्रमादः स्वप्नतन्द्रिता |  ३५   क
कथञ्चिदभिवर्तन्ते विविधास्तामसा गुणाः ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति