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शान्ति पर्व
अध्याय १८७
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भीष्म उवाच
सृजते हि गुणान्सत्त्वं क्षेत्रज्ञः परिपश्यति |  ४२   क
सम्प्रय़ोगस्तय़ोरेष सत्त्वक्षेत्रज्ञय़ोर्ध्रुवः ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति