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शान्ति पर्व
अध्याय १८७
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भीष्म उवाच
यथा वारिचरः पक्षी लिप्यमानो न लिप्यते |  ४६   क
एवमेव कृतप्रज्ञो भूतेषु परिवर्तते ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति