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शान्ति पर्व
अध्याय १८७
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भीष्म उवाच
न भवति विदुषां ततो भय़ं; यदविदुषां सुमहद्भय़ं भवेत् |  ५८   क
न हि गतिरधिकास्ति कस्य चि; त्सति हि गुणे प्रवदन्त्यतुल्यताम् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति